Mirza Ghalib Ki Sharo Shayari: Ghalib Collection of Urdu Poem (Mirza Ghalib’s Popular Urdu Couplets) (Hindi Edition)


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(as of May 13,2021 12:50:15 UTC – Particulars)


मिर्जा ग़ालिब अपने आप में बेमिसाल शायर हैं। ग़ालिब का नाम आज देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो नहीं जानता हो। उनकी शोहरत के पीछे दो खास वजह हैं, पहला कारण उनकी मोहब्बत भरी शायरी, उनका चंचल स्वभाव, लतीफेबाज़ी और कटाक्ष करने की आदत। फारसी के दौर में ग़ज़लों में उर्दू और हिंदी का इस्तेमाल कर उन्होंने आम आदमी की जबान पर चढ़ा दिया। उन्होंने जिन्होंने जीवन को कोरे कागज़ की तरह देखा और उस पर दिल को कलम बनाकर दर्द की स्याही से जज़्बात उकेरे। उनकी ज़िंदगी का फलसफा ही अलग था। यथा—
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
गालिब का जन्म उनके ननिहाल आगरा में 27 दिसंबर, 1797 को हुआ। उनके पिता फौज में नौकरी के दौरान इधर-उधर घूमते रहे, इसलिए इनका पालन-पोषण ननिहाल में ही हुआ। जब वे पाँच साल के थे, तभी पिता का साया सिर उठ गया। बाद में उनके चाचा नसीरुल्लाह उनका पालन करने लगे, लेकिन जल्दी ही उनकी भी मौत हो गई और वे स्थायी रूप अपने ननिहाल आकर रहने लगे। मिर्जा ग़ालिब शुरू में ‘असद’ नाम से रचनाएँ करते थे। बाद में उन्होंने ग़ालिब उपनाम अपनाया। इस प्रकार उनका पूरा नाम मिर्जा असद उल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ था।
ग़ालिब ने फारसी की शुरुआती तालीम आगरा के तत्कालीन विद्वान् मौलवी मोहम्मद मोअज्जम से हासिल की। बाद में वे ईरान से आगरा आए फारसी और अरबी के प्रतिष्ठित विद्वान् मुल्ला अब्दुस्समद के संपर्क (1810-1811) में आए। मुल्ला अब्दुस्समद दो साल आगरा में रहें इस दौरान ग़ालिब ने उनसे फारसी एवं काव्य की बारीकियों का ज्ञान प्राप्त किया। ग़ालिब से अब्दुस्समद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी सारी विद्या ग़ालिब में उँडेल दी। और ग़ालिब 11 साल की उम्र में ही शेरो-शायरी करने लगे। तेरह साल की उम्र में 9 अगस्त, 1890 को लोहारू के नवाब अहमद बख्श खां के छोटे भाई मिर्जा इलाही बख्श ‘मारूफ’ की 11 साल की बेटी उमराव बेगम से उनका निकाह हुआ। शादी के पहले ग़ालिब कभी-कभी दिल्ली आते थे, मगर शादी के दो-तीन साल बाद दिल्ली आ गए और फिर यहीं के होकर रह गए।
दिल्ली में उन दिनों शायराना माहौल था। ग़ालिब का भी उन मुशायरों में जाना होता और उसकी चर्चा अक़सर होती। एक तो वे फलसफी शायर थे, दूसरे उनके कलाम बहुत मुश्किल होते थे। मुशायरों, जलसों व महफिलों में इनकी मुश्किलगोई के चर्चे आम थे। वे बहुत जल्दी ही शोहरत की बुलंदियों पर पहुँच गए। उन्होंने उर्दू शायरी को एक नया आयाम दिया। उन्होंने उर्दू शायरी को तंग गलियारों—हुस्न व इश्क़, गुलो व बुलबुल में न घोटकर नई पहचान दी।
ग़ालिब खर्चीले व उदार स्वभाव के थे, जिसके चलते अक़सर तंगहाल रहते। यहाँ तक की कभी-कभी पास में फूटी कौड़ी न होती। एक बार उधार की शराब पीकर पैसा न देने पर उन पर मुफ्ती सदरूद्दीन की अदालत में मुकदमा चला। आरोप सुनकर ग़ालिब ने सिर्फ एक शेर सुनाया।
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ,
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
इतना सुनना था कि मुफ्ती साहब ने अपने पास से रुपए निकालकर दिए और ग़ालिब को जाने दिया।


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Mirza Ghalib Ki Sharo Shayari by Mahesh Dutt Sharma

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मिर्जा ग़ालिब अपने आप में बेमिसाल शायर हैं। ग़ालिब का नाम आज देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो नहीं जानता हो। उनकी शोहरत के पीछे दो खास वजह हैं, पहला कारण उनकी मोहब्बत भरी शायरी, उनका चंचल स्वभाव, लतीफेबाज़ी और कटाक्ष करने की आदत। फारसी के दौर में ग़ज़लों में उर्दू और हिंदी का इस्तेमाल कर उन्होंने आम आदमी की जबान पर चढ़ा दिया। उन्होंने जिन्होंने जीवन को कोरे कागज़ की तरह देखा और उस पर दिल को कलम बनाकर दर्द की स्याही से जज़्बात उकेरे। उनकी ज़िंदगी का फलसफा ही अलग था। यथा— रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल, जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है गालिब का जन्म उनके ननिहाल आगरा में 27 दिसंबर, 1797 को हुआ। उनके पिता फौज में नौकरी के दौरान इधर-उधर घूमते रहे, इसलिए इनका पालन-पोषण ननिहाल में ही हुआ। जब वे पाँच साल के थे, तभी पिता का साया सिर उठ गया। बाद में उनके चाचा नसीरुल्लाह उनका पालन करने लगे, लेकिन जल्दी ही उनकी भी मौत हो गई और वे स्थायी रूप अपने ननिहाल आकर रहने लगे। मिर्जा ग़ालिब शुरू में ‘असद’ नाम से रचनाएँ करते थे। बाद में उन्होंने ग़ालिब उपनाम अपनाया। इस प्रकार उनका पूरा नाम मिर्जा असद उल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ था।

महेश दत्त शर्मामहेश दत्त शर्मा

महेश दत्त शर्मा

हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक महेश दत्त शर्मा का लेखन कार्य सन् 1983 में आरंभ हुआ, जब वे हाईस्कूल में अध्ययनरत थे।बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से 1989 में हिंदी में स्नातकोत्तर। उसके बाद कुछ वर्षों तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए संवाददाता, संपादक और प्रतिनिधि के रूप में कार्य।लिखी व संपादित दो सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाश्य। भारत की अनेक प्रमुख हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में तीन हजार से अधिक विविध रचनाएँ प्रकाश्य।हिंदी लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक पुरस्कार प्राप्त, प्रमुख हैं—मध्य प्रदेश विधानसभा का गांधी दर्शन पुरस्कार (द्वितीय), पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी, शिलाँग (मेघालय) द्वारा डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति पुरस्कार, समग्र लेखन एवं साहित्यधर्मिता हेतु डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान, नटराज कला संस्थान, झाँसी द्वारा लेखन के क्षेत्र में ‘बुंदेलखंड युवा पुरस्कार’, समाचार व फीचर सेवा, अंतर्धारा, दिल्ली द्वारा लेखक रत्न पुरस्कार इत्यादि।

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